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Thursday, April 7, 2011

मैं भी धीरे धीरे जानने लगा हूँ..........


तेरे शब्दों कि सजावट
तेरी बातों कि बनावट
कहा चली जाती हे
जब तुझे बाकई
सच बोलना होता हे
सच बोलने के नाम पर
तुम अक्सर बगले
क्यूँ झाँकने लगते हो!
तुम बाकई छलिया हो
या ये मेरे सोचने का
एक गलत ढंग,
जो तुम्हरी रचनाओ से
प्रेरित करता है मुझे
कि तुम शायद ऐसे ही हो
एक सच्चे दिल वाले इंसान,
लेकिन मैं भी कितना पागल हूँ
कि मैं ये कैसे भूल जाता हूँ
कि तुम सबसे पहले
हो एक इंसान,
जिसकी सामाजिक बाध्येताए
उसको रोकती हैं
सच बोलने से,
उसे मालूम हे कि उसको
सिर्फ कहलाने भर का
इंसान ही बनना हे
दिखावा करना हे.
ताकि उसका अस्तित्व
बना रहे, इस मिथ्या संसार में
अगर उसने सच बोलने कि
हिम्मत कि, तो उसको भी
"अन्ना हजारे" कि तरहा
शायद जंतर-मंतर पर
आमरण अनशन पर बैठना
होगा!,
वो जानता हे कि सच बोलना
भी कभी इतना आसान होता हे
शायद नही!
अब मुझे उससे कोई
गिला-शिकवा नही हे!
मैं भी धीरे धीरे
जानने लगा हूँ!

Wednesday, April 6, 2011

सुबह सुबह चालू हो गए.....

.
जैसे ही हमने अपनी मित्र को
हाई हेल्लो बोला, और पूछा
आज इतनी सुबह, इतनी जल्दी
नेट पर कैसे नजर आ रही हो,
रात भर नींद  नहीं आई ?
उन्होंने तुरंत दी सफाई ,
मेल देखने थी आई !
हमने मन ही मन मुस्कराते हुए कहा
हाँ हाँ , ठीक हे, हमने कब कहा
कि हमें देखने हो आई !
बैसे हम काफी दिनों के बाद
चाट पर उनसे रु-बा-रु हो रहे थे!
उन्होंने तपाक से दिया रिप्लाई
क्या हे, तुम भी न! (कितनी मिठास हे इन शब्दों मैं)
सुबह सुबह चालू हो गए,
हमने तुरंत उनकी बात को पकड़ा
और कहा आज तो आप एक दम
से पोजिटिव हो रहे हो,
फिर बोला कोई नहीं, आफ्टर नून ही सही
हम बाद में चालू हो लेंगे,
बस आपको सहूलियत होनी चाहिए!
टाइम आपके एक्कोर्डिंग ही रहेगा,
इतना कहते ही उन्होंने
ग्राफिकली अपनी आँखे तरेरी
और फिर धीरे से कहा "चुप्प"
फिर कई सारी स्माइली(मुस्कान)
एक साथ ही चेप दी,
और कहा बाद में मिलती हूँ!
हमें कह ओके डियर , इट्स ओके
सी यू देन! हेव अ वोंड़ेर्फुल डे अहेड!