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Friday, January 7, 2011

आज का इंसान

आज का इंसान

इस कद्र है हैवान

सांप से भी

ज्यादा दंशवान

इंसान, मरता हे

सांप के काटने से,

लेकिन ये इंसान

इंसान के काटे बिना

ही, इंसान द्वारा ,

मार दिया जाता है,

सांप काटने से

पहले फुंफकारता है

लेकिन ये इंसान

चुपचाप, बिना फुफकारे

ही डस लेता हे,

जब तक समझ

में आता है!

तब तक उसका काम

तमाम हो जाता हे!

सांप तो अक्सर ही

केंचुली बदलता हे

लेकिन ये , इंसान

ओढ़े रहता हे

केंचुली पर केंचुली;

कैसे पहचानोगे

इस इंसान को

जिसकी खुद कि

खुद को नही होती हे

कोई पहचान!

Wednesday, December 29, 2010

शाकाहारी मुर्गी

हे न कुछ अजीब सा संबोधन

मगर हे ये सत्ये,

बात कुछ ऐसे ही चल रही थी

या कहे कि जुबान फिसल रही थी

बातों ही बातों में वो बोले

कुछ लिखने का मूड बना रहे हैं

हमने कहा हम भी ,मूड बनायेंगे

घर जाकर कुछ न कुछ पकाएंगे

सुरा पर तो अपना अधिकार हे

बिना सुन्दरी के मन बहलाएँगे!

वो बात को तुरंत ताड़ गए

बोले सुंदरी घर पर नही हे?

बात सुरा से शुरू होकर

सुन्दरी पर अटक गई

हमने कहा रोज दाल-रोटी

खाकर गुजारा करते हैं,

बोली आपका इशारा

हम समझ रहे हैं

लगता आप किसी मुर्गी

कि तलाश में भटक रहे हैं;

हमने मौके कि नजाकत को

तुरंत भांपा!

और अपना पासा तुरंत

मोह्तिर्मा पर फेंक डाला,

वो हमारी सोच से कही

ज्यादा, उस्ताद निकली,

और बोली, आपको

मटन -टिक्का, या चाहिए

चिक्केन चिली ?

आप रोंग नंबर डायल

कर रहे हैं,

यहाँ मुर्गी तो हे

मगर शाकाहारी हे

फिर क्यूँ आप गलत-फ़हमी में

पल रहे हैं!

उनके इस संबोधन से

हम पानी पानी हो गए

और उनकी इस अदा के

हम दीवाने हो गए!

हमने कहा हम इस

शाकाहारी मुर्गी को भी

पकाएंगे, मगर क्या पता था

कि बातों ही बातों में

ये कविता लिख जायेंगे!