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Monday, February 7, 2011

कहाँ जाते हो रुक........




कहाँ जाते हो रुक जाओ

तुम्हे कम्युनिटी कि कसम देखो

बिना पोलिटिक्स न रह पाओगे

जाकर इक कदम देखो,



बनाये रिश्ते लाखों तो क्या

निभा इक भी न पाए तुम

दिखावा इतना किया जालिम

कि अब पछताते क्यूँ हो तुम,



मुंह में रखते हो तुम "रामा"

बगल मैं छुरी देखो पैनी

बहाया खून रिश्तों का

कि आत्मा भी हुई छलनी,



क्यूँकर ऐसा किया तुमने

ये तुमको भी शायद पता न हो

वक़्त रहते जो समझ जाते

फिर क्यूँ किस से खता ये हो,



अब जो हुआ सो हो चूका

सुधरकर तुम संभल जाओ

इल्तजा इतनी सी हे जानम

तुम बापिस लौटकर आओ!

Friday, February 4, 2011

कुछ कुंडलिया -एक कोशिश






चेहरा रोज बदल कर, मचा रहे हैं शोर

दुनिया थू-थू कर रही, मन में इनके चोर,



मन में इनके चोर, खींचे किसकी ये टंगिया

ऐसा जोता हल , कि उजड़ गयी सारी बगिया,



उजड़ गयी सारी बगिया, बने फिर अनजान

अच्छे खासे चमन को, बना दिया शमशान.



बना दिया शमशान ,बहाए घडियाली आंसू

घर में पिटते रोज, इनको याद आये सासू,



कह बाबा "गौरव" ,न दूजा कोई उपाए

जूते मारो १०० इनको, दो उल्टा लटकाए,



दो उल्टा लटकाए, कि तबियत हरी हो जाये

जिदंगी में फिर न, कभी ये ऐसा कदम उठाएं !!