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Wednesday, March 17, 2010

सूरत-ए-बेवफाई

हमारी चाहत को इस कद्र बदनाम न करो

दिल कि आवाज है ये, इसे सरे-आम न करो,



करना नही था प्यार, फिर ये दिल क्यूँ लगाया

ठुकराकर हमारी मुहब्बत को, हमें बदनाम न करो,



क्या जरूरी था दोस्ती के लिए, इजहारे मुहबब्त

इस दोस्ती और मुहब्बत को शर्मशार न करो,



काश कि इतना आसान होता इजहारे मुहब्बत

फिर से तुम लैला-मजनू कि कहानी बयां न करो,



दिखा ही चुके हो तुम, अपनी सूरत-ए-बेवफाई

खुदा के वास्ते अब, इजहारे-ए-जुर्म न करो,

Friday, March 5, 2010

मुझे नही पता,......

जैसे ही हमने कुछ लिखने के लिए कलम उठाई

उसकी याद, समय कि चादर से छन छन के आई

में चाहता हूँ कि , उसको नही लिखूंगा अब कभी

में पहले से ही इतना कुछ लिख चूका हूँ उस पर

मगर वो जेहन में इस कद्र बस चुकी है मेरे

कोई बात,उसका ख़याल आये बिना शुरू नही होती

मैं जितना भी उसको भूलना चाहता हूँ

वो पहले से ज्यादा याद आने लगती है

और मेरी कलम को मुह चिढाने लगती है

और कहती है, काश कि मुझको भूलना

इतना आसान होता तुम्हारे लिए

ये मैं भी जानती हूँ, और तुम भी जानते हो

फिर मुझसे मुह क्यूँ मोड़ते हो बार बार

अगर तुम बाकई मुझसे अलग लिखना चाहते हो

तो पहले मुझे अपना लो, अपना बना लो,

लेकिन हकीकत भी यही है,

कि वो मेरी कलम का साथ नही छोडती

अब किसने किसको जकड रखा है

मुझे नही पता,......

में असमंजस में हूँ, कि क्या करू, क्या न करू

मेरा प्यार उससे भी है, और मेरी कलम से भी