जाना बूझकर हम उस रह पर चल पड़े थे
जिस पर कांटे ही कांटे बिखरे पड़े थे,
हमें यकीन था की कभी तो बहार आएगी,
यही सोचकर हम उनके साथ हो लिए थे,
लेकिन यही धोखा था हमारे दिल का
की जिन्हें हम कांटे समझे, वो खंजर निकले,
वो चुभते रहे, जख्म बनते रहे,
हाल ये हुआ कि दर्द जिस्म से नही
दिल से उठा,
यहाँ तक कि आत्मा भी चीत्कार कर उठी
और कहने लगी, किस रह पर ले आया दीवाने
बापिस चल, अभी भी वक़्त हे तेरे पास,
हम पलट चले, ढेर सारे जख्म लिए
लेकिन इस बार दर्द कही से भी नही उठा
क्यूंकि वो पहले इस कद्र उठ चूका था
शायद वो खुद ही ख़त्म हो चूका था
Monday, December 7, 2009
Saturday, November 21, 2009
स्वाभिमान
स्वाभिमान
एक अमीर ने गरीब से पूछा
बोल तू स्वाभिमानी है,
गरीब बोला, बाबु जी कोशिश तो
बहुत करता हूँ, की कोई
काम मिल जाये तो
दो वक़्त की रोटी का सहारा हो जाये,
लेकिन हर वक़्त ऐसा नही होता पाता,
हर रोज़ अपने भूखे, नंगे बच्चो,
व चिथरों में लिपटी लिपटी वीबी
का चेहरा सामने आ जाता,
क्या करूं साब,
मेने तो मजबूरी में
अपने स्वाभिमान को कई बार बेचा है,
आप तो अच्छे खासे पैसे बाले हैं,
भगवन का दिया सभी कुछ तो है तुम्हारे पास,
फिर आपकी ऐसी क्या मजबूरी है,
जो आप लखपति से करोरपति बन्ने के लिए
हमारे जैसे गरीबों का स्वाभिमान खरीदकर
अपने आपको स्वाभिमानी समझते हो.
एक अमीर ने गरीब से पूछा
बोल तू स्वाभिमानी है,
गरीब बोला, बाबु जी कोशिश तो
बहुत करता हूँ, की कोई
काम मिल जाये तो
दो वक़्त की रोटी का सहारा हो जाये,
लेकिन हर वक़्त ऐसा नही होता पाता,
हर रोज़ अपने भूखे, नंगे बच्चो,
व चिथरों में लिपटी लिपटी वीबी
का चेहरा सामने आ जाता,
क्या करूं साब,
मेने तो मजबूरी में
अपने स्वाभिमान को कई बार बेचा है,
आप तो अच्छे खासे पैसे बाले हैं,
भगवन का दिया सभी कुछ तो है तुम्हारे पास,
फिर आपकी ऐसी क्या मजबूरी है,
जो आप लखपति से करोरपति बन्ने के लिए
हमारे जैसे गरीबों का स्वाभिमान खरीदकर
अपने आपको स्वाभिमानी समझते हो.
Subscribe to:
Posts (Atom)