मुझे याद हैं वो दिन
जब मैं तुमको और तुम
मुझको लिखा करती थी,
हमारा हर गीत, हर ग़ज़ल,
एक दुसरे में ढला करती थी,
हम नदी के वो दो किनारे थे
जिसमे बहता पानी हमारे मिलन का
शाक्क्षी हुआ करता था,
फिर अचानक एक दिन तूफ़ान आया
नदी ने अपना रुख बदल दिया,
तुम मेरा साथ छोड़ कर
किसी दुसरे किनारे से जा मिली,
और फिर से बही गीत-ग़ज़ल
गुनगुनाने लगी
मैं आज भी विराना सा
तुमको दूर से निहारता रहता हूँ,
इसी झूठी उम्मीद में शायद
फिर से ऐसा कोई तूफ़ान आये
एक बार फिर से तुमको
मुझसे मिला जाये,
हम फिर से अपनी मुहब्बत के तराने
एक दुसरे को सुनाये
हम फिर से बही गीत-ग़ज़ल गुनगुनाये
मुझे याद हैं वो दिन
जब मैं तुमको और तुम मुझको लिखा करती थी,
Thursday, June 10, 2010
Wednesday, June 9, 2010
क्या होता हे
जब भी जाता हूँ उसके दर पर उसे गुमान होता हे
वो शख्स ऐसा है जो कभी कभी हैरान होता हे
भूल जाऊँ अगर जाना मैं उसके दर पर कभी
वो शख्स मुझसे मिलने का बेहद तलबगार होता हे
कुछ तो बात हे उसके और मेरे दरमियाँ
बरना क्यूँ ढूँढ कर मुझे वो मेहरबान होता हे
क्या तड़प हे हमारी इक-दूजे के लिए नही जानते
कभी में परेशां , to कभी वो परेशान होता हे
नहीं पड़े आजतक हम आशिकी में गौरव
दिल कहता हे कि पड़ भी जाओ तो क्या होता हे
वो शख्स ऐसा है जो कभी कभी हैरान होता हे
भूल जाऊँ अगर जाना मैं उसके दर पर कभी
वो शख्स मुझसे मिलने का बेहद तलबगार होता हे
कुछ तो बात हे उसके और मेरे दरमियाँ
बरना क्यूँ ढूँढ कर मुझे वो मेहरबान होता हे
क्या तड़प हे हमारी इक-दूजे के लिए नही जानते
कभी में परेशां , to कभी वो परेशान होता हे
नहीं पड़े आजतक हम आशिकी में गौरव
दिल कहता हे कि पड़ भी जाओ तो क्या होता हे
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