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Tuesday, June 22, 2010

कुछ यूँ ही

जहा देखो, जब देखो

इसे देखो, उसे देखो,



किस किस को देखो

अपने सिवा सबको देखो,



कभी अपने को भी देखो!



ढूंढ़ लेगा जिस दिन तू खुद को खुदही में

मिल जायेगा तुझको खुदा खुदही में,



फिर न होगी कोई गलफ़त इस जहाँ में

जिस दिन बन जायेगा इंसान तू खुदही में,



नसीहते सबको और खुद को फजीहते

अब बस भी कर खुद जरा झांक खुदही में

3 comments:

Sunil Kumar said...

" नसीहते सबको और खुद को फजीहते" सुंदर रचना बधाई

अनामिका की सदाये...... said...

sunder abhivyakti

महेन्द्र मिश्र said...

बहुत बढ़िया रचना भाई....आभार