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Sunday, November 21, 2010

गरीबों के लिए रोटी मांगता हूँ......


बस गरीबों के लिए रोटी मांगता हूँ
सुदामा के लिए श्री कृष्ण मांगता हूँ
जरुरत आज हे यहाँ तुम्हारी प्रभु
आज भूख से कितना त्रस्त हे मनुज
तोड़ दो प्रभु इन युगों के बंधन को
ऐसा वर मैं तुमसे आज मांगता हूँ

बस गरीबों के लिए रोटी मांगता हूँ

ये तंत्र अब कालातंत्र हो चूका हे
इंसानियत का इसकदर क्षरण हो चुका हे
मर चुकी हे आत्मा इन सभी कि
अब तो जीवन-मरण का प्रश्न हो चुका हे
नहीं भरते हैं पेट जिनके भरे हुए हैं
इस कद्र ये जमीन पर गिरे हुए हैं
नही दिखती भूख से तड़पती जिन्दगी
फिर भी ये गरीबो के रहनुमा बने हुए हैं

भर रहे हैं ये घर अपना दिनों-रात
नही सुनाई पड़ती इनको भूखो कि आवाज
बेशर्मी से कहते हैं कि गोदाम भरे हुए हैं
फिर भी वो लोग भूख से मर रहे हैं
जब किसी खून कि सजा फांसी हे यहाँ
फिर ये हत्यारे क्यूँ खुलेआम घूम रहे हैं
लटका दो इन हत्यारों को फांसी पर
मैं ऐसा ही कुछ कानून मांगता हूँ
बस गरीबों के लिए रोटी मांगता हूँ
सुदामा के लिए श्री कृष्ण मांगता हूँ

6 comments:

प्रवीण पाण्डेय said...

क्या सरल भाव हैं, बस देश के गरीबों को भोजन मिल जाये।

रश्मि प्रभा... said...

बस गरीबों के लिए रोटी मांगता हूँ
सुदामा के लिए श्री कृष्ण मांगता हूँ
जरुरत आज हे यहाँ तुम्हारी प्रभु
bahut badhiyaa

उपेन्द्र said...

बेहतरीन प्रस्तुति ... गहरे जज्बात के साथ लिखी गई सुंदर कविता

ashish said...

सुन्दर भाव है आलोक जी , लगता है सुदामा की सुनने वाले कृष्ण गहरी निद्रा में है .

अजय कुमार said...

ईश्वर से प्रार्थना है कि आपके मांग पर गौर फरमाये ।

well wisher said...

Nice पोस्ट .
चाँद है जेरे कदम और सूरज खिलौना हो गया
हां , मगर इन्सान का किरदार बौना हो गया .