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Wednesday, December 1, 2010

फासला ....


इक कदम तुम और इक कदम हम बढ़ाये
आओ अब हम कुछ इस तरह करीब आऐं
न हो फासला अब इक सांस का भी बाकि
मुद्दतों से हमने चाहतों के दीप हैं जलाये

4 comments:

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

वाह वाह ..क्या बात है ..

प्रवीण पाण्डेय said...

चाहतें बहुत समय बाद ही स्थायीरूप में जल पाती हैं।

उपेन्द्र said...

वाह अलोक जी, क्या बात है सुंदर सोंच....बहुत ही प्यारी नज़्म .

संजय भास्कर said...

वाह वाह वाह वाह वाह वाह
..........क्या बात है ..