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Monday, August 6, 2012

<----भाव खाना (नखरे मारना) -->

Blog parivaar

अरे ओ कलुआ, हाँ माँ मुझे इसी नाम से बुलाती थी! शायद घर में सबसे ज्यादा सम्बला रंग
मेरा ही था! मैं थोडा अनमना सा माँ के पास जाता हाँ माँ बोलो, माँ बुरादे कि अंगीठी के पास
बैठी शाम कि चाय बना रही होती है! कहती जा जाकर अपने बाबूजी को चाय दे आ! स्कूल से
आने के बाद टूशन पढ़ा रहे हैं, थकान हो रही होगी! मैं चाय का कप लेकर बाबू जी के कमरे में
जाता, और कहता बाबू जी चाय..

बाबू जी शायद थकान के मारे या अत्येधिक परिश्रम के कारन
गुस्से में चिल्लाते ले जाओ चाय मुझे नही पीनी! मैं एक बार अनमने मन से कोशिश करता कि पी
लो, बाबू जी पहले से भी जोरो से चिल्लाते कहा न बापिस ले जा! मैं डर के मरे चाय का कप बापिस ले
जाकर माँ के पास आ जाता! माँ कहती क्या हुआ, मैं कहता नही पी रहे , चिल्ला रहे हैं, माँ के
चेहरे पर तनाव साफ़ झलकता था! लेकिन कोई उपाए नही! फिर कहती ठीक है रख दे, छोटे को भेज
उसी के हाथ भेजती हूँ! बाबू जी और छोटे भाई का तालमेल अनूठा था, दोनों एक दूसरे को अच्छे से
समझते थे, लेकिन उस वक़्त मेरा बाल मन इसको कुछ और ही समझता था, कि बाबू जी मेरे हाथ
से चाय नही लेते, जबकि छोटे के हाथ से ले लेते थे! या हो सकता हे कि वो जाकर बाबू जी कि मनुहार
करता हो कि पी लीजिये! और मेरे से ये सब होता नही था! मैं उस वक़्त 8th क्लास में था! तब मैं सोचता था कि बाबू जी के पैसे कि चाय बाबू जी फिर भी नखरे क्यूँ मारते हैं! पीनी हे तो पियो नहीं पीनी तो
मत पीओ! खैर जो भी हो, कई बार ऐसा होता था कि घर में सिर्फ मैं ही होता था, तब माँ के पास
कोई चारा नही होता था मुझको ही चाय लेकर भेजती थी, और कहती थी कि बेटा जबरदस्ती रख
के आ जाना! मैं कुछ नही कहता और चाय लेकर चला जाता, बाबू जी उसी तरह का बर्ताव नही पीनी
ले जाओ बापिस, मैं रखने कि कोशिश करता बाबू जी जोरो से चिल्लाते बहरा हे क्या सुना नही! मैं डर के
मरे बापिस ले आता! माँ के चेहरे पर फिर तनाव, और वो जानती थी कि आज तो कोई और हे भी नही,
चाय कैसे पियेंगे तेरे बाबू जी, मैं कहता माँ छोटा टूशन से आ जायेगा तो उसके हाथ भेज देना! ये सिलसिला
चलता ही रहता था! और बाबू जी अपने इस बर्ताव के करना कई बार बिना चाय कि ही रह जाते थे!
माँ अपनी ड्यूटी पूरी शिद्दत से करती थी, रोजमर्रा का यही काम था, ऐसा अक्सर ही होता था कि मैं ही
घर पर होता था, मैं माँ कि मज़बूरी समझता था, साथ ही बाबू जी के वर्ताब से भी आहत था, लेकिन
जब माँ चाय बनाती तो मुझे आवाज नही देती, लेकिन मैं जाकर माँ से कहता कि ला माँ मैं बाबू जी
को चाय दे आऊ, माँ मना कर देती थी, रहने दे तेरे हाथ से नही लेंगे, लेकिन मैं जिद्द करता के दे तो
सही, देखता हूँ कब तक नही लेंगे मेरे हाथ से, अब मैं चाय लेकर बाबू जी के कमरे में जाता, बाबू जी तिरछी
नजरों से मुझे देखते और पढ़ाने में मशगूल हो जाते, मैं धीरे चाय टेबल पर रख कर कमरे के बाहर आ जाता
और कन्खिओं से देखता कि बाबू जी चाय पी रहे हैं या नही, उधर माँ का तनाव अपनी जगह, फिर मैं देखता कि बाबू जी चाय पी रहे हैं, मैं आकर माँ को खुशखबरी देता कि आज तो बाबू जी न चाय पी ली! माँ के
चेहरे पर आये संतुष्टि के भाव से मैं आत्मविभोर हो जाता! फिर मैं सोचता कि अब बाबू जी क्यूँ नही चिल्लाते
मैं जब भी चाय लेकर जाता! शायद इसलिए कि उनको पता हे कि ये मन-मनुहार नही करने वाला, इसलिए खामखा नखरे दिखाने में अपना ही नुक्सान है! मेरा बाल मन उस वक़्त इतना ही सोच पाता था! इसको
मैं अपनी जीत भी मानने लगा था, कि कोई भी इंसान भाव(नखरे) क्यूँ खाता है! और ये मेरी तभी से आदत
भी पड़ गयी कि खामखा के नखरे किसी के भी नही सहने.. जब मैंने अपने ही बाबू जी के नखरे नही सहे,
तो किसी और कि तो बात ही क्या है! .....

(इक ख़याल अपना सा! .......... कथानक सच्ची घटना पर आधारित है! आप सभी के कमेंट्स का आपकी
बहुमूल्य राय के साथ स्वागत है!

4 comments:

kshama said...

Ye sach hai ki bachpankee kitnee saaree baten,bhulaye nahee bhoolteen!

प्रवीण पाण्डेय said...

आदर और नखरों में अन्तर है..

expression said...

सहज लेखन.....
लिख डाली मन की...बिना नखरे के!!!!

सादर
अनु

dheerendra said...

जब मैंने अपने ही बाबू जी के नखरे नही सहे,
तो किसी और कि तो बात ही क्या है! .....

प्रवीण जी ने ठीक कहा आदर और नखरे अंतर होता है,
RECENT POST...: जिन्दगी,,,,