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Wednesday, August 18, 2010

गुलामी और आज़ादी .......

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एक दिन हमारी श्रीमती जी का
परा सातवे आसमान के पार पहुच गया
बोली मेरी किस्मत फूट गयी
जो तुमसे मेरी शादी हुई
इससे तो होती ही नही, तो ही अच्छी थी
मेने कहा प्रिये, सिर्फ १३ साल में ही
हमसे ऊब गयी,
लगता हे तुम सच्ची हिन्दुस्तानी नही हो
कही से इम्पोर्ट किया हुआ आइटम हो
बोली क्या फालतू बकवास करते हो
मेरे हिन्दुस्तानी होने पर शक करते हो
मेने कहा अभी आपने जो कहा
उसी से अंदाज़ा लगाया हे हमने
अरे अगर तुम सच्ची हिन्दुस्तानी होती
तो उनके सब्र कि तरह अपना भी सब्र रखती
उनको देखो वो पिछले ६३ साल से नही ऊबे
उन्होंने तो कभी नही कहा
कि आज़ादी क्यूँ मिली
इससे तो गुलाम ही अच्छे थे
देखो वो आज भी कितनी शिद्दत से
अपनी आज़ादी का जश्न मनाते हैं
जिन्हें न सोने को छत
ना खाने को रोटी, न पीने का पानी
फिर भी उनके जज्बे को देखो
सीखो उनसे से कुछ,
जिन्हें कुछ भी मयस्सर नही हे
वो भी कहते हे कि हम आज़ाद हे
तुम्हे तो ये सब हासिल हे
फिर भी कहती हो कि
गुलामी कि जिन्दगी नही जीनी
श्रीमती जी कि समझ में
कुछ आया , कुछ नही आया
बोली, आप भी कितने अजीब हैं
हम कौन से रोज़ रोज़ नाराज होते हैं
जब भी होते हैं, आप ऐसे ही हमें
समझा देते हैं, लोग तो
आज़ादी का जश्न मनाते हैं
लेकिन आप तो हमें नही मनाते हैं
मेने मन ही मन सोचा
यार श्रीमती जी सच कह रही हे
ये तो बैसे भी घर का मामला हे
यहाँ कौन देख रहा हे, मना ही लेता हूँ
ये कौन सी गुलामी हे
आज़ादी का जश्न भी तो हम मनाते हैं
क्या हम हकीकत में आजाद हैं
मेरी सोच इस गुलामी और आज़ादी
कि चक्कर को समझने में भटक गयी
मेरी कलम भी अब यही पे अटक गई

4 comments:

आलोक मोहन said...

bahut hi acchi aur sheek deti kavita

रश्मि प्रभा... said...

waah waah .... jitni tareef karun kam hai, sahi kataksh

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

बहुत बढ़िया व्यंग है ...

ALOK KHARE said...

aap sabhi ka hirdye se abhaar, aise hi utsah badhate rahiye